वत्सl गोत्रीय

 


• सोवानी

• सुग्वेलकर

• गादे


• रामनाथ


• शंथेरी

• कामाक्षी

600वीं शदी ई.पू. के सोलह महाजनपद

हालाँकि 600वीं शदी ई.पू. के जनपदों कि संख्या अठारह थी परन्तु महाजनपदों में निम्नलिखित सोलह की ही गणना होती थी (चेति और सूरसेन महाजनपद की श्रेणी में नहीं थे) :-


1. अंग

2. कौशल

3. मल्ल

4. काशी

5. वत्स

6. मगध

7. विज्जी

8. विदेह

9. कुरु

10. पांचाल

11. मत्स्य

12. अस्मक

13. अवंती

14. कुंतल

15. गांधार

16. कम्बोज

अन्य जातियों में वत्स गोत्र

हालांकि ब्राह्मणों (भूमिहार ब्राह्मण सम्मिलित) के अलावा अन्य जातियों में गोत्र प्रथा अनिवार्य नहीं है फिर भी कतिपय प्रमुख जातियों में गोत्र परंपरा देखी जाती है इनके गोत्र, 'गोत्र-ऋषि उत्पन्न' नहीं वल्कि गोत्र-आश्रम आधारित हैं अर्थात जिस ऋषि आश्रम में वे संलग्न रहे उन्होंने उसी ऋषि-गोत्र को अपना लिया|
इसी सिद्धांत पर कुछ क्षत्रिय परिवारों में वत्स गोत्र पाया जाता है| यही सिद्धांत अन्य कुछ जातियों में भी प्रचलित है| इस तरह वत्स गोत्र अंकुरित, पल्लवित, पुष्पित एवं फलित हो दिन-दूनी और रात-चौगुनी विकास पथ पर अग्रसर होता चला जा रहा है|

मै एक विनीत वत्सl गोत्रीय सोनभद्रीवत्सl गोत्रीयय सदस्य इसके सतत उत्तरोत्तर उन्नति की कामना करता हूँ|

ईश्वर हमें सद्बुधि दे और सदा सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा दे|
"तमसो मा ज्योतिर्गमय, असतो मा सद्गमय"
ईश्वर हमें अंधकार(अज्ञान) से प्रकाश(ज्ञान) की ओर एवं असत्य से सत्य की ओर ले चले|

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